जानता हू- उदास होन्गे बच्चे
तुमने भी कोई कसर न छोडी होगी
उनकी मान्ग पूरी करने मे,
उन्हे मनाने
कपडे-खिलौने लाने का भी ख्याल रखा होगा तुमने .
कब आऊन्गा ?
शायद सरकार बदले इस बार
तो नई करवट लेगा प्रशासन भी
शायद तब आ सकू…
मध्यावधि चुनाव के बाद महन्गाई ?
उसकी क्या चिन्ता !
साथ-साथ सह लेन्गे…
उम्मीद ? वह तो छलिया है, टूटती नही कभी
टूट जाये तो हो जाये, इस पार या उस पार
रोज़ाना किश्तो मे टूटते-टूटते
मेरे पूरी तरहटूट जाने से पहले..
हा भई, वह भी देखा है कई बार
आफ़िस के कम्प्यूटर मे ही लोड कर लिया है
सोफ़्टवेयेर कुन्डली वाला
देखता हू अक्सर
लिखा है- साल अच्छा गुज़रेगा
इसलिए भी है उम्मीद…
ऐसा क्यो होता है?
यू समझो कि एक गाव बन गई है धरती
वैश्वीकरण के इस दौर मे
अनुचित है, अनैतिक है
परिवार से दूर रहकर उदास होना
बस काम करना, खटना..
तुम ना समझो, ना सही
मै भी कहा समझ पाता हू
पर समझाओ बच्चो को
धीरे-धीरे-धीरे…….. !
September 30, 2007 at 1:21 pm
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September 30, 2007 at 3:27 pm
आत्मदर्शीजी, हिन्दी चिट्ठेकारी शुरु करने पर हार्दिक बधाई स्वीकार करें।लिखना सतत जारी रखें।आपकी प्रविष्टियों की प्रतीक्षा रहेगी।
September 30, 2007 at 6:04 pm
स्वागत है हिंदी चिट्ठाजगत में
October 1, 2007 at 10:39 am
आत्मदर्शी जी,
आपका हिन्दी चिट्ठाकारी में अभिनन्दन है!