Archive for October, 2007

सरकारी झूठ को हवा देते नौकरशाह और कुछ भोले लोग…

October 12, 2007

दूरदर्शन को लगातार देखते रहने से यह तो पता चल ही जाता है कि कभी-कभी मुह खोलने वाले नौकरशाह किस कदर झूठ बोलते है… कुछ मिसाले मुलाहज़ा फ़रमाइए —

१.उत्तर प्रदेश के कुछ हिस्सो मे एक बार बेमौसम बरसात हुई, किसानो ने अपनी व्यथा बयान की, पर एक नौकरशाह ने कृषि मन्त्री की हा मे हा मिलाते हुए कहा कि ये बारिश एग्रीकल्चर के लिये अच्छी है,कह रहा था कि apple की खेती के लिये ये बारिश अच्छी है… सुनकर खून खौल गया… अरे भई, मुआवज़ा नही देना है तो मत दो, झूठ बोलकर सच को झूठ तो मत बनाओ कि मैदानो मे सेब की खेती होती है, किसानो की सच्ची पीडा को अपनी मूर्खताजनित कुटिल बयानबाज़ी का विषय तो मत बनाओ, वैसे भी किसान तुमसे कोई उम्मीद नही रखते.

२. ऐसा ही कपास की खेती को लेकर कुछ साल पहले महाराष्ट्र मे कुछ नेताओ और अफ़सरो ने नौटन्की की थी कि वर्षा के कारण कपास की फ़सल को ज्यादा नुकसान नही हुआ है…किसान तिलमिला रहे थे..

३. हमारा देश अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर आगे बढ रहा है… यह एक बहुत बडा झूठ है…कुछ लोग आगे बढ रहे है, पर आम आदमी तो जहा था, वही है…बल्कि और नीचे ही गिरा है..इन दिनो मुम्बई मे माल-सन्स्कृति का जिस तरह विरोध हो रहा है, वह ध्यान देने लायक है, जो सम्वेदनशील है, वह चुप नही बैठेगा…एक पढा-लिखा आदमी मुझसे कह रहा था कि कोला-पेप्सी आदि ने लोगो को रोज़गार दिया है… उस आदमी की केरल मे बडी फ़ैक्टरी है… मैने कहा- आप ठीक कहते है, जब आपकी फ़ैक्टरी की बगल मे कोला-पेप्सी अपनी फ़ैक्टरी लगा लेगी और धीरे-धीरे आपकी फ़ैक्टरी को कब्ज़िया लेगी, तब भी आप यही कहेन्गे., अभी तो आप देश-विदेश मे वनस्पतियो के रसायन बेचते है, बाद मे एक पान की दुकान खोल कर कोला-पेप्सी बेचियेगा.

मुत्ताह है केन्द्रीय विद्यालय के अध्यापक की पीडा

October 7, 2007

मेरे अनेक मित्र है, जो भारत सरकार के मानव सन्साधन विकास मन्त्री के इशारो पर चलने वाले केन्द्रीय विद्यालय मे अध्यापक है… दुनिया को सीख देने वाले सन्स्थान मे मन्त्री और अफ़सर इस कदर अध्यापको का शोषण करते है कि उसका वर्णन किया जाये तो कई पन्ने भर जाएन्गे… अध्यापको को पगलाये कुत्तो की तरह दुरदुराया जाता है… मुरली मनोहर जोशी के ज़माने मे केन्द्रीय विद्यालय सन्गठन के आयुकत की कुर्सी पर हर्ष महान कैरे को बिठाया गया था, जनाब ने अध्यापको को चिकन, बकरे या मछली से ज्यादा ना समझा… वह भूल गया था कि इन्सान को उसकी जडो से उखाड्ने पर वह कही का नही रहता… ट्रान्स्फ़र के नाम पर अध्यापको को दूर दराज़ के स्थानो पर भेजा गया, जैसे उनको गवर्नर बना कर भेजा जा रहा हो… पर इतना तो था कि तीन-चार साल की कालावधि बाद उनको वान्छित स्थान मिल जाता था… पर इसी कारण मुरली मनोहर जोशी के २००४ मे हार भी हुई… भाजपा की हार के पीछे जोशी का अनैतिक जोश भी था…फ़िर ज़माना आया कान्ग्रेस का… अर्जुन सिन्ह मा.स.वि.मन्त्री बने तो उन अध्यापको के भाग्य जागे और मनचाहा स्थान मिल गया… अर्जुन बाण की चर्चा होने लगी वाह! वाह! … पर आठ महीने बीतते -बीतते वह भी अपनी असलियत पर आ गये..नये आयुक्त ने नये नियम बनाकर कईयो को दूर-दराज़ जगहो पर भेज दिया…और इस कारस्तानी के तुरन्त बाद नियम को बदल दिया गया, जैसे कि कुछ गिने-चुने लोगो को ही हटाने के लिये नियम बनाया हो और कार्य सिद्ध होते ही पुराना नियम ले आया गया… एक और मज़ेदार बात यह देखने मे आ रही है, कैरे महान के ज़माने से ही कि चिकित्सा के आधार पर मास्टरो को ट्रन्स्फ़र मे जो वरीयता मिलती है, उसका प्रमाण-पत्र भी हैरान करने वाला है… उसमे ऐसे-ऐसे रोगो तथा रोगो की स्थितियो की बात कही गयी है कि अगर वे रोग उक्त स्टेज़ पर पहुन्चे हो तभी उनके आवेदन पर विचार किया जायेगा… डाक्टर तो कह्ते है कि वे स्थितिया ज़िन्दा नही, बल्कि मरणासन्न व्यक्ति के लिये ही सम्भव है या फ़िर जो पोस्ट-मार्टम के लायक हो… अब भी ऐसा हीच ल रहा है…कोई बताये अर्जुन और आयुक्त जामुदा जी को कि यह चालबाज़ी छोड कर वास्तविक समस्या को देखे और उन्हे दूर करने का उपाय करे…मेरे मित्र लगभग तीन वर्ष असम मे रहकर लखनऊ आये थे, २००४ मे अर्जुन बाण की तारीफ़ करते हुए, पर आठवे महीने उनको परिवार से दूर भेज दिया गया… यानि हार्ड स्टेशन पर काम करने के बाद भी उनको मनचाही जगह न मिली, जैसा कि नियम है…

कहने का अभिप्राय यह है कि बेचारे मास्टर लोग बडे परेशान है… केन्द्रीय विद्यालय सन्गठन सडक के किनारे या गलियो मे घूमने वाला खुज़ली का मारा कुत्ता है, जिसे हर आने-जाने वाला ठोक के चलता बनता है और मास्टर उसके पिल्लो की तरह है, जो परेशान होते है…

एक और बात, के.वि.स. मे अन्याय नही होता, सब कुछ नियमानुसार होता है, यह दूसरी बात है कि मास्टरो की ऐसी-तैसी करने के लिए मुत्ताह जैसे नियम बना कर ऐसी-तैसी-कैसी-कैसी की जाती है….मेरी जानकारी के अनुसार , अगर आप पुरुष है और अपने घर से दूर, बिना पत्नी के है तो मुत्ताह के अनुसार आप दो-चार घण्टो के लिये शादी करके स्त्री-सुख पा सकते है, फ़िर सुबह होते ही उसको तलाक देकर उससे मुक्त हो सकते है, उसमे कोई अनैतिकता नही है…यह विभाग भी मुत्ताह के अनुसार चल रहा है.

एक बीमा एजेन्ट की पीडा

October 3, 2007

सत्पथी जी मेरे मित्र है और बीमा एजेन्ट है…कुछ भारतीय कम्पनिओ ने जो विदेशी कम्पनिओ से मिलकर बीमा सन्स्थाये बनायी है, उनसे बहुत दुखी है.. कहते है कि ये नई कम्पनिया पुराने वाहनो का बीमा नही करती है… फ़िर अनुबन्ध ऐसे है कि ग्राहक को नुकसान होता है… जैसे एक व्यक्ति ने अपनी गाडी का बीमा कराया और जिले से बाहर उसे जाना पडा… दुर्भाग्य से दुर्घट्ना हो गई… कम्पनी ने दावा नही माना. वह व्यक्ति न्यायालय मे गया.. न्यायालय ने ही उसपर ५००० रुपये का ज़ुर्माना लगा दिया… हुआ क्या ? हुआ यह कि बीमे की पालिसी के पीछे लिखा था कि यदै ३० किलोमीटर के दायरे के बाहर दुर्घटना होगी तो कम्पनी दावे को नही मानेगी …

सत्पथी जी का कहना है कि सरकारी बीमा कम्पनी तो सच मे ही जन-सेवा कर रही है, पर उदारीकरण के कारण आयी कम्पनिया जनता को चूस रही है….  सत्पथी जी एक अच्छे एजेन्ट है… कई कम्पनिया उनके पास दौड रही है कि वे उनकी कपनी के लिए काम करे, पर उन्होने मना कर दिया… वे सभी को समझते है, पर भारत सरकार को नही समझ पाते… इसीलिए अक्सर मेरे सामने अपनी भडास निकालते है…

छोटी छोटी कविताये

October 1, 2007

चान्द है सुन्दर मगर कब पास है

गीत है लेकिन गले का दास है

है सुरा मधुमय मगर उपवास है

अस्तित्व तेरा भी यू ही अहसास है..

प्रेम क्या है, ज़िन्दगी का एक सम्मोहक सपन है

है सफल तो वासना है, असफल है तो रुदन है…

जी चाहता है दोस्त हम तुमसे न कुछ कहे

मगर वह सज़ा क्या जिसके लिए तैयार तुम रहो !

जानते है तुम समन्दर बन के न हमसे मिलोगे

तपते रेगिस्तान मे लेकिन सफ़र सुहाना है…

धूप रेगिस्तान-सी पा फूल उपवन मे जले

मूर्ख है वे जो सुकोमल भावनाओ मे पले

हो हृदय पाषाण के, तन भी लोहे के बने

ताकि तपकर ताप मे भी विविध सान्चो मे ढले…