एक बीमा एजेन्ट की पीडा

By aatmadarshee

सत्पथी जी मेरे मित्र है और बीमा एजेन्ट है…कुछ भारतीय कम्पनिओ ने जो विदेशी कम्पनिओ से मिलकर बीमा सन्स्थाये बनायी है, उनसे बहुत दुखी है.. कहते है कि ये नई कम्पनिया पुराने वाहनो का बीमा नही करती है… फ़िर अनुबन्ध ऐसे है कि ग्राहक को नुकसान होता है… जैसे एक व्यक्ति ने अपनी गाडी का बीमा कराया और जिले से बाहर उसे जाना पडा… दुर्भाग्य से दुर्घट्ना हो गई… कम्पनी ने दावा नही माना. वह व्यक्ति न्यायालय मे गया.. न्यायालय ने ही उसपर ५००० रुपये का ज़ुर्माना लगा दिया… हुआ क्या ? हुआ यह कि बीमे की पालिसी के पीछे लिखा था कि यदै ३० किलोमीटर के दायरे के बाहर दुर्घटना होगी तो कम्पनी दावे को नही मानेगी …

सत्पथी जी का कहना है कि सरकारी बीमा कम्पनी तो सच मे ही जन-सेवा कर रही है, पर उदारीकरण के कारण आयी कम्पनिया जनता को चूस रही है….  सत्पथी जी एक अच्छे एजेन्ट है… कई कम्पनिया उनके पास दौड रही है कि वे उनकी कपनी के लिए काम करे, पर उन्होने मना कर दिया… वे सभी को समझते है, पर भारत सरकार को नही समझ पाते… इसीलिए अक्सर मेरे सामने अपनी भडास निकालते है…

2 Responses to “एक बीमा एजेन्ट की पीडा”

  1. अभिनव Says:

    आत्मदर्शी जी; मेरे बास की गाड़ी का विंडस्क्रीन टूट गया और रिलायन्स इन्शुरेन्स इसके लिये कुल खर्च दस हजार बता रहे थे जिसमें बास को अपनी जेब से चार हजार लगाने थे.

    बजाय इन्शुरेन्स क्लेम के हमने शीशा बाजार से सिर्फ 3980 में बदलवा लिया.
    अभी उस गाड़ी पर नो-क्लिम बोनस बरकरार है.

    इन्शुरेन्स पर कस्बा के रवीश कुमार ने भी बहुत अच्छा लिखा था, मुझे तब बहुत पसंद आया था.

  2. RAJESH Says:

    bahut khub, sachai byan karne ke liye sadhwad

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