मुत्ताह है केन्द्रीय विद्यालय के अध्यापक की पीडा

By aatmadarshee

मेरे अनेक मित्र है, जो भारत सरकार के मानव सन्साधन विकास मन्त्री के इशारो पर चलने वाले केन्द्रीय विद्यालय मे अध्यापक है… दुनिया को सीख देने वाले सन्स्थान मे मन्त्री और अफ़सर इस कदर अध्यापको का शोषण करते है कि उसका वर्णन किया जाये तो कई पन्ने भर जाएन्गे… अध्यापको को पगलाये कुत्तो की तरह दुरदुराया जाता है… मुरली मनोहर जोशी के ज़माने मे केन्द्रीय विद्यालय सन्गठन के आयुकत की कुर्सी पर हर्ष महान कैरे को बिठाया गया था, जनाब ने अध्यापको को चिकन, बकरे या मछली से ज्यादा ना समझा… वह भूल गया था कि इन्सान को उसकी जडो से उखाड्ने पर वह कही का नही रहता… ट्रान्स्फ़र के नाम पर अध्यापको को दूर दराज़ के स्थानो पर भेजा गया, जैसे उनको गवर्नर बना कर भेजा जा रहा हो… पर इतना तो था कि तीन-चार साल की कालावधि बाद उनको वान्छित स्थान मिल जाता था… पर इसी कारण मुरली मनोहर जोशी के २००४ मे हार भी हुई… भाजपा की हार के पीछे जोशी का अनैतिक जोश भी था…फ़िर ज़माना आया कान्ग्रेस का… अर्जुन सिन्ह मा.स.वि.मन्त्री बने तो उन अध्यापको के भाग्य जागे और मनचाहा स्थान मिल गया… अर्जुन बाण की चर्चा होने लगी वाह! वाह! … पर आठ महीने बीतते -बीतते वह भी अपनी असलियत पर आ गये..नये आयुक्त ने नये नियम बनाकर कईयो को दूर-दराज़ जगहो पर भेज दिया…और इस कारस्तानी के तुरन्त बाद नियम को बदल दिया गया, जैसे कि कुछ गिने-चुने लोगो को ही हटाने के लिये नियम बनाया हो और कार्य सिद्ध होते ही पुराना नियम ले आया गया… एक और मज़ेदार बात यह देखने मे आ रही है, कैरे महान के ज़माने से ही कि चिकित्सा के आधार पर मास्टरो को ट्रन्स्फ़र मे जो वरीयता मिलती है, उसका प्रमाण-पत्र भी हैरान करने वाला है… उसमे ऐसे-ऐसे रोगो तथा रोगो की स्थितियो की बात कही गयी है कि अगर वे रोग उक्त स्टेज़ पर पहुन्चे हो तभी उनके आवेदन पर विचार किया जायेगा… डाक्टर तो कह्ते है कि वे स्थितिया ज़िन्दा नही, बल्कि मरणासन्न व्यक्ति के लिये ही सम्भव है या फ़िर जो पोस्ट-मार्टम के लायक हो… अब भी ऐसा हीच ल रहा है…कोई बताये अर्जुन और आयुक्त जामुदा जी को कि यह चालबाज़ी छोड कर वास्तविक समस्या को देखे और उन्हे दूर करने का उपाय करे…मेरे मित्र लगभग तीन वर्ष असम मे रहकर लखनऊ आये थे, २००४ मे अर्जुन बाण की तारीफ़ करते हुए, पर आठवे महीने उनको परिवार से दूर भेज दिया गया… यानि हार्ड स्टेशन पर काम करने के बाद भी उनको मनचाही जगह न मिली, जैसा कि नियम है…

कहने का अभिप्राय यह है कि बेचारे मास्टर लोग बडे परेशान है… केन्द्रीय विद्यालय सन्गठन सडक के किनारे या गलियो मे घूमने वाला खुज़ली का मारा कुत्ता है, जिसे हर आने-जाने वाला ठोक के चलता बनता है और मास्टर उसके पिल्लो की तरह है, जो परेशान होते है…

एक और बात, के.वि.स. मे अन्याय नही होता, सब कुछ नियमानुसार होता है, यह दूसरी बात है कि मास्टरो की ऐसी-तैसी करने के लिए मुत्ताह जैसे नियम बना कर ऐसी-तैसी-कैसी-कैसी की जाती है….मेरी जानकारी के अनुसार , अगर आप पुरुष है और अपने घर से दूर, बिना पत्नी के है तो मुत्ताह के अनुसार आप दो-चार घण्टो के लिये शादी करके स्त्री-सुख पा सकते है, फ़िर सुबह होते ही उसको तलाक देकर उससे मुक्त हो सकते है, उसमे कोई अनैतिकता नही है…यह विभाग भी मुत्ताह के अनुसार चल रहा है.

One Response to “मुत्ताह है केन्द्रीय विद्यालय के अध्यापक की पीडा”

  1. afloo Says:

    आत्मदर्शी ने मित्र अध्यापको की व्यथा को खूब कलपा ।

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