दूरदर्शन को लगातार देखते रहने से यह तो पता चल ही जाता है कि कभी-कभी मुह खोलने वाले नौकरशाह किस कदर झूठ बोलते है… कुछ मिसाले मुलाहज़ा फ़रमाइए —
१.उत्तर प्रदेश के कुछ हिस्सो मे एक बार बेमौसम बरसात हुई, किसानो ने अपनी व्यथा बयान की, पर एक नौकरशाह ने कृषि मन्त्री की हा मे हा मिलाते हुए कहा कि ये बारिश एग्रीकल्चर के लिये अच्छी है,कह रहा था कि apple की खेती के लिये ये बारिश अच्छी है… सुनकर खून खौल गया… अरे भई, मुआवज़ा नही देना है तो मत दो, झूठ बोलकर सच को झूठ तो मत बनाओ कि मैदानो मे सेब की खेती होती है, किसानो की सच्ची पीडा को अपनी मूर्खताजनित कुटिल बयानबाज़ी का विषय तो मत बनाओ, वैसे भी किसान तुमसे कोई उम्मीद नही रखते.
२. ऐसा ही कपास की खेती को लेकर कुछ साल पहले महाराष्ट्र मे कुछ नेताओ और अफ़सरो ने नौटन्की की थी कि वर्षा के कारण कपास की फ़सल को ज्यादा नुकसान नही हुआ है…किसान तिलमिला रहे थे..
३. हमारा देश अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर आगे बढ रहा है… यह एक बहुत बडा झूठ है…कुछ लोग आगे बढ रहे है, पर आम आदमी तो जहा था, वही है…बल्कि और नीचे ही गिरा है..इन दिनो मुम्बई मे माल-सन्स्कृति का जिस तरह विरोध हो रहा है, वह ध्यान देने लायक है, जो सम्वेदनशील है, वह चुप नही बैठेगा…एक पढा-लिखा आदमी मुझसे कह रहा था कि कोला-पेप्सी आदि ने लोगो को रोज़गार दिया है… उस आदमी की केरल मे बडी फ़ैक्टरी है… मैने कहा- आप ठीक कहते है, जब आपकी फ़ैक्टरी की बगल मे कोला-पेप्सी अपनी फ़ैक्टरी लगा लेगी और धीरे-धीरे आपकी फ़ैक्टरी को कब्ज़िया लेगी, तब भी आप यही कहेन्गे., अभी तो आप देश-विदेश मे वनस्पतियो के रसायन बेचते है, बाद मे एक पान की दुकान खोल कर कोला-पेप्सी बेचियेगा.